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शनिवार, 28 नवंबर 2015

मौत को सहज बनाती है मेडिटेशन की तिब्बती विधि

मौत को सहज बनाती है मेडिटेशन की तिब्बती विधि


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यह लगभग आठवीं शताब्दी की बात है जब तिब्बत में प्राकृतिक आपदा अपने पूरे जोर पर थी। कोई भी उपाय काम नहीं कर रहा था जबकि बड़ी संख्या में लोग हताहत हो रहे थे। ऐसे में तिब्बती सम्राट ने भारत की ओर बड़ी आशा से देखा तथा विख्यात बौद्ध आचार्य पद्म संभव को सादर निमंत्रण भिजवाया।

आचार्य के लिए धर्मसंकट की स्थिति थी। वे अनिर्णय की अवस्था में थे। पाटलिपुत्र को छोड़ तिब्बत के लिए प्रस्थान करने का अर्थ था जीवनभर के लिए भारतवर्ष से जुदा हो जाना। तिब्बत के राजा ने अपने दूत को दुबारा भेजा ताकि आचार्य को वहां आने के लिए मनाया जा सके। खैर......आचार्य ने कड़े हृदय से नालंदा को अलविदा करने का मन बनाया ताकि तिब्बत की समस्या का निदान कर सकें।

यह समय था भारत में वज्रयान के चरम का। तंत्रयान की ही दूसरी शाखा वज्रयान में तांत्रिक प्रयोगों का बहुत सूक्ष्मता से प्रयोग किया जाता था। आचार्य पद्म संभव ने तिब्बत पहुंचकर तंत्र प्रयोगों की श्रृंखला स्थापित की तथा तिब्बती आपदा का बड़ी मात्रा में निवारण किया। यही वजह रही कि तिब्बत में वज्रयान के विविध प्रकार अपनी जड़ें जमाते गए और धीरे-धीरे राजाश्रय मिलने के कारण बौद्ध धर्म वहां पूरी तरह स्थापित हो गया।

आचार्य पद्म संभव ने एक बड़ा ही अद्भुत प्रयोग किया। उन्होंने मृत्यु को सहज बनाने तथा पुनर्जन्म के चक्रण से मुक्त होने के लिए “बारदो थोडाल” नामक एक मेडिटेशन अथवा ध्यान की पद्धति विकसित की, जिसका उपयोग मृत्यु के द्वार पर खड़े इंसान के साथ किया जाता है।

हैरान करने वाली है मृत्यु को सहज बनाने की ये विधा, जिसमें ऐसे किसी भी व्यक्ति के सामने कुछ लोग एक खास तरह के मंत्र का उच्चारण करते हैं। मूलतः इस मंत्र का उद्देश्य ये होता है कि मृत्यु के द्वार पर मौज़ूद व्यक्ति पूरी तरह जाग्रत अवस्था में हो तथा उसे ये एहसास हो कि वह केवल शरीर को त्यागने जा रहा है। मृत्यु उसके लिए एक उत्सव बने न कि भय का एहसास।    

बारदो के सूत्र व्यक्ति को ये एहसास कराने के लिए हैं कि तुम एक यात्रा पर निकल रहे हो इसलिए बोध या फिर जागरण की अवस्था में रहो। जब भी मृत्यु शय्या पर लेटा हुआ व्यक्ति आंख मूंदने लगता है तो उसके कान में बारदो के सूत्र को दोहराया जाता है। उससे कहा जाता है कि तुम केवल शरीर त्याग रहे हो इसका तुम्हें भान होना चाहिए। तुम दूसरा शरीर धारण करोगे लेकिन वह गलतियां नहीं दोहराओगे जिसे तुमने इस शरीर में रहते हुए किया है। तुम्हें याद रहना चाहिए कि इस चक्र से तभी मुक्ति मिलेगी जबकि तुम अगले जन्मों में इस जन्म में हुई भूलों को नहीं दोहराओगे।

निश्चित रूप ये प्रयोग क्रांतिकारी है। पूरी दुनिया में मृत्यु का ऐसा आयोजन और कहीं नहीं किया जाता है। मृत्यु जब शोक न रहकर मुक्ति बन जाए तो आनंद जन्म लेता है..............मृत्यु जब एक अद्भुत संयोग बन जाए तो मुक्ति मिल जाती है........मृत्यु जब एक इंतजार बन जाए तो उत्सव घटित होता है। कुछ ऐसाअ ही बारदो का प्रयोग, जिसे इसलिए आजमाया जाता है ताकि इंसान पुनः-पुनः उन्हीं गलतियों को न दोहराए जो उसने वर्तमान शरीर में रहते हुए की है।

होशपूर्ण मृत्यु, जाग्रत अवस्था की मृत्यु, बोध की मृत्यु कुछ ऐसी ही अवस्था प्राप्त की जाती है बारदो के सूत्र के द्वारा। इसमें मृत्यु मोक्ष बन जाती है और दुबारा शरीर धारण करने पर व्यक्ति उन मूढ़ताओं को करने से बच जाता है, जो उसने पिछले जन्म में की थी। 

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